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सद्गुरु वचनों का सरल व सुंदर सार

8 दिसंबर 20251 मिनट में पढ़ें

गुरूमहाराज जी कहते हैं—

जब तक हृदय में संसार की आसक्ति है, परमात्मा दूर रहता है।
जैसे भोग पहले सुख देते हैं और बाद में दुख, वैसे ही माया की चाह अंत में पीड़ा ही देती है।
ईश्वर की कृपा पाने के लिए किसी चतुराई की नहीं—केवल शुद्ध, नम्र और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता है।

जो साधक हर पल गुरु को याद करता है, उसे ऐसा सुख मिलता है जिसका कोई अंत नहीं।
भक्ति की यात्रा पाँच रत्नों से सरल होती है—
प्रेम, नम्रता, नीति, युक्ति और आज्ञा।

सद्गुरु का हाथ जिस पर होता है,
कठिनाई उसकी ओर बढ़ ही नहीं सकती।
शब्द उसकी आत्मा का कवच बन जाता है।

नम्रता से कृपा बरसती है, और प्रेम से प्रभु स्वयं दौड़े चले आते हैं।
सच्चा सेवक वही है जो अपने मन की नहीं, गुरु की आज्ञा की राह पर चलता है।

भक्ति ही सच्चा धन है—
धन–मान, शोहरत सब छूट जाएंगे
पर नाम और सद्गुरु का प्रेम जन्म–जन्मांतर साथ रहेगा।

कष्ट आएंगे, पर यदि मन शब्द में लगा होगा
तो वे स्पर्श भी नहीं कर पाएंगे।

यदि मन शुद्ध हो जाए, सोच पवित्र हो जाए,
तो प्रभु की कृपा हर दिशा से बहने लगती है।

अंत में सद्गुरु एक ही मंत्र देते हैं—
“मन को प्रेम में रखो, चिंता मुझे सौंप दो।”

जो ऐसा कर लेता है,
वही इस जीवन में भी सुखी होता है और परलोक में भी।

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