Self Awakening Mission · निःशुल्क
दिव्य अमृत धारा
45 ध्यान और सत्संग, 23 घंटे की आत्मिक यात्रा। सुनिए, डाउनलोड कीजिए, हमेशा अपने पास रखिए।
यह वह अमृत है जिसकी तलाश में साधक जन्मों तक भटकते हैं: सतगुरु के स्वरूप का ध्यान, नाम का सिमरन, ध्यान की हर सीढ़ी की समझ और परमहंसों की लीलाएँ। संजीव मलिकSanjiv Malik जी इसे Self Awakening Mission के माध्यम से हर घर तक सहज, निःशुल्क पहुँचा रहे हैं। यह गुरु कृपा ही है कि आज यह आपके फ़ोन में, एक click पर है।
कहाँ से शुरू करें?
- 🎧 Headphones लगाकर, शांत जगह पर, आँखें बंद करके सुनें।
- 🌅 अमृत वेला (सुबह 4 से 6 बजे) सबसे उत्तम समय है।
- ⬇️ "डाउनलोड" दबाकर फ़ोन में रख लें, फिर बिना internet भी सुनें।
- ▶️ जहाँ छोड़ा था, वहीं से चलेगा। "एक के बाद एक" चालू हो तो अगला अपने-आप।
गुरु ध्यान Guided Meditations · 19
आँखें बंद कीजिए, ऑडियो चलाइए और बस साथ चलिए। हर ध्यान आपको सतगुरु के स्वरूप, नाम और प्रेम में धीरे-धीरे उतारता है। शुरुआत करने वालों के लिए सबसे अच्छा।
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श्री आरती ध्यान
क्या ध्यान में सतगुरु का साक्षात अनुभव हो सकता है?
इस आरती ध्यान में लगता है जैसे आप खुद आरती में खड़े हैं: गुरु का रूप, उनकी मुस्कान, उनका स्पर्श और करुणा आत्मा को भीतर तक छू लेते हैं। यह सुनने का नहीं, जीने का अनुभव है; एक बार उतर गए तो मन बार-बार इसी प्रेम में लौटना चाहेगा।
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श्री मूरत ध्यान
क्या आँखें बंद करके भी गुरु का पूरा स्वरूप देखा जा सकता है?
चरणों से लेकर मुखारविंद तक, गुरु का दिव्य रूप धीरे-धीरे अंतर में प्रकट होने की विधि। ध्यान गहराता है तो मन शांत होता जाता है; यह केवल visualization नहीं, अंतर का साक्षात्कार है।
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दर्शन हॉल ध्यान
क्या ध्यान में पूरा दरबार, आरती और गुरु का आगमन देखा जा सकता है?
ऐसा जीवंत अनुभव कि लगता है आप सच में दर्शन हॉल में बैठे हैं: सतगुरु का आगमन, जयकारे, आशीर्वाद, सब आपके सामने। यह ध्यान मन को नहीं, आत्मा को छूता है।
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अमृत वेला ध्यान
क्या सच में अमृत वेला में जागने से जीवन बदल सकता है?
अमृत वेला का अभ्यास सौ गुना असरदार क्यों होता है: गुरु शब्द का जाप, तीसरे नेत्र पर ध्यान और जागने का संकल्प मिलकर मन, नींद और पूरे दिन को बदल देते हैं।
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सुबह का ध्यान
क्या सुबह का पहला विचार आपके पूरे दिन की दिशा तय कर सकता है?
सुबह 4 बजे अमृत वेले का यह ध्यान सीधे सतगुरु से जोड़ता है: गुरु चरणों में ध्यान, भ्रूमध्य में उनकी छवि और साँसों के साथ नाम का सिमरन। सुबह सतगुरु के साथ शुरू हुई तो पूरा दिन ध्यान और आनंद में बीतता है।
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मानसिक शांति ध्यान
क्या सिर्फ़ देखने भर से मन के विकार खत्म हो सकते हैं?
काम, क्रोध, मोह और अहंकार को केवल साक्षी बनकर देखना, और उनसे छूटते जाना। धीरे-धीरे 'मैं' भी गायब होने लगता है और बचती है सिर्फ़ शांति। तनाव और बेचैनी के दिनों के लिए।
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प्रेम स्वरूप ध्यान
क्या इंसान खुद प्रेम का स्वरूप बन सकता है?
गुरु का प्रेम ऐसा भीतर उतरता है कि हर साँस, हर भाव और हर विचार प्रेम बन जाता है, मानो उनके करकमलों से प्रेम की धारा सीधे आत्मा में बह रही हो।
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सतगुरु चिंतन (भाग 1)
क्या सिर्फ़ चिंतन से इंसान गुरुमुख बन सकता है?
भ्रूमध्य में ध्यान लगाकर सतगुरु के गुणों का चिंतन: आप केवल सोचते नहीं, धीरे-धीरे उनके जैसा बनना शुरू कर देते हैं। स्वभाव बदलने वाला ध्यान।
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दर्शन ध्यान
क्या आपने ऐसा ध्यान किया है जहाँ आँखें खुली हों और मन पूरी तरह खो जाए?
सतगुरु की पावन मूरत को सामने रखकर अपलक दर्शन, इतने प्रेम से कि कोई दूसरा विचार न बचे। फिर आँखें सहज बंद होती हैं और वही छवि भ्रूमध्य में उतर आती है: बाहरी दर्शन से भीतर के मिलन तक।
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नाम महिमा ध्यान
क्या सच में केवल एक 'नाम' पूरी ज़िंदगी बदल सकता है?
साँसों पर ध्यान रखकर सतगुरु के दिए नाम का सिमरन। हर साँस के साथ अनुभव होता है कि यह कोई साधारण शब्द नहीं, स्वयं सतगुरु का निराकार रूप है; मन शांत होता है और भीतर अनोखा आनंद प्रकट होता है।
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सिमरन ध्यान
हर साँस को फूल बनाकर गुरु चरणों में कैसे अर्पित करें?
स्मरण, ध्यान और समर्पण एक ही प्रवाह में। प्रथम पातशाही से हुजूर दाता दयाल जी तक सभी परमहंस स्वरूपों का ध्यान: लगता है साँस भी गुरु की हो गई, ध्यान भी, और हृदय भी।
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गुरु शब्द चिंतन
क्या सच में एक शब्द आपकी पूरी ज़िंदगी बदल सकता है?
यहाँ साधक केवल जप नहीं करता, उस दिव्य गुरु शब्द को साँसों के साथ भीतर उतरते महसूस करता है। ध्यान त्रिकुटी पर टिकता है तो भीतर का अँधेरा छँटने लगता है: यह जप नहीं, आत्मा को उसके स्रोत तक ले जाने वाला मार्ग है।
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दर्शन की प्यास
क्या आपने ऐसी तड़प महसूस की है जहाँ सिर्फ़ एक ही चाह बचे: दर्शन की?
इस ध्यान में सिमरन के साथ भीतर सतगुरु के दीदार की गहरी प्यास जगाई जाती है। ध्यान भ्रूमध्य में टिकता है तो मन नाम में डूबता चला जाता है।
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दिव्य दरबार ध्यान
क्या आप तैयार हैं अपने हृदय में सतगुरु के दिव्य दरबार के दर्शन के लिए?
कल्पना नहीं, अनुभव: ऊँचे सिंहासन पर विराजमान परम प्रिय सतगुरु, मधुर मुस्कान, करुणा भरी दृष्टि। जैसे ही आप उनके चरणों में सिर रखते हैं, भीतर की अशांति, तनाव और भय पिघलने लगते हैं।
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प्रेम पुकार (निमंत्रण)
जैसे मंदिर में आते हो, वैसे ही मेरे हृदय-मंदिर में भी आओ…
आत्मा अपने प्रियतम सतगुरु को बार-बार भीतर आने का निमंत्रण देती है: उनका चिट्टा चोला, मधुर मुस्कान, विशाल नेत्र और करुणा भरा मुखड़ा प्रेम से निहारते हुए। सुनते ही आँखें नम और हृदय कोमल हो जाता है।
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गुणसागर सतगुरु
क्या एक ही ध्यान में प्रेम, ज्ञान और अद्वैत तीनों का अनुभव हो सकता है?
साधक केवल अपने भीतर नहीं उतरता, हर जीव, हर हृदय, हर चेतना में उसी एक सतगुरु को देखने लगता है। गुणों के सागर सतगुरु से जुड़ने का गहरा अनुभव।
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अद्वैत ध्यान
क्या सच में 'मैं' और सतगुरु अलग नहीं हैं?
नाम के अभ्यास के साथ यह देखना शुरू होता है कि नाम जपने वाला कौन है, साँस कौन ले रहा है। प्रश्न भीतर उठता है: अगर वह और मैं एक ही हैं, तो मेरा असली स्वरूप क्या है?
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परम संतोष ध्यान
हमारी बेचैनी की वजह बाहर की कमी है, या अंदर की इच्छाएँ?
मन की उस आदत को पहचानना जो हर समय कुछ न कुछ चाहती रहती है और उसी में दुखी रहती है। इच्छाएँ जितनी शांत होती हैं, संतोष उतना गहरा होता है: भीतर का खालीपन भरने वाला ध्यान।
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सतगुरु मेरे वैद्य
क्या कोई ऐसी औषधि है जो शरीर, मन और आत्मा, तीनों के रोग मिटा सके?
सतगुरु को वैद्य मानकर उनके दिए नाम को औषधि की तरह ग्रहण करना। साँसों के साथ शब्द का सिमरन चलता है तो भीतर उपचार और हल्केपन का अनुभव होता है।
ध्यान की 5 अवस्थाएँ Dhyan Stages · 5
ध्यान क्यों नहीं लगता, मन कैसे टिकता है, भीतर रोशनी या खिंचाव क्यों महसूस होता है: साधना की हर सीढ़ी को सरल शब्दों में समझाने वाले सत्संग। क्रम से सुनिए।
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ध्यान की अवस्था 1: सही शुरुआत (साधन)
सही शुरुआत मिल जाए, तो क्या नाम-सिमरन अपने आप चलने लगता है?
ध्यान और सिमरन की पहली और सबसे ज़रूरी अवस्था, सही नींव, इतने सरल पर गहरे ढंग से कि साधक की आधी उलझन यहीं खत्म हो जाती है। नए साधक यहीं से शुरू करें।
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ध्यान की अवस्था 2: ध्यान क्यों नहीं लगता
ध्यान न लगने की सबसे बड़ी वजह मन नहीं, हमारी गलत शुरुआत तो नहीं?
ध्यान की दूसरी अवस्था का रहस्य, खासकर उन साधकों के लिए अमूल्य जिन्हें लगता है कि 'हमसे ध्यान नहीं होता'।
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ध्यान की अवस्था 3: टिकाव आना
क्या ध्यान में 'टिकाव' आना ही भीतर की यात्रा का पहला चमत्कार है?
मन भटकता क्यों है और उसे टिकाना कैसे है: ध्यान की तीसरी अवस्था को समझकर साधक अपने अभ्यास को नई गहराई देता है।
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ध्यान की अवस्था 4: संतुलन
ध्यान में आगे बढ़ने का सबसे बड़ा रहस्य अभ्यास है, या जीवन का संतुलन?
वह सच्चाई जिसे बहुत साधक देर से समझते हैं: जीवन असंतुलित हो तो ध्यान टिकेगा ही नहीं। खान-पान, नींद, व्यवहार और साधना में संतुलन की सीख।
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ध्यान की अवस्था 5: रोशनी, खिंचाव और भीतर के दृश्य
क्या ध्यान में सच में रोशनी, झटके, भीतर खिंचाव और अनोखे दृश्य दिखते हैं?
ध्यान गहराने पर आने वाले अनुभवों का रहस्य: सुनकर साधक के मन की बहुत-सी उलझनें अपने आप सुलझने लगती हैं।
परमहंसों की लीला Leela Satsang · 10
श्री परमहंस दयाल जी और पातशाहियों के जीवन की सच्ची, चमत्कारी घटनाएँ। सुनते-सुनते श्रद्धा अपने आप गहरी होती है और विश्वास पक्का होता है।
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श्री परमहंस दयाल जी: पावन अवतरण
क्या सच में परमात्मा स्वयं मानव रूप लेकर धरती पर उतरता है?
श्री परमहंस दयाल जी के अवतरण, तप, वैराग्य, दिव्य यात्राओं और युग बदल देने वाले जीवन की झलक। सुनकर मन श्रद्धा से भर उठता है।
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श्री परमहंस दयाल जी की दिव्य लीलाएँ
क्या कोई महापुरुष अदृश्य शक्तियों को भी वश में कर सकता है?
श्री परमहंस दयाल जी की अद्भुत लीलाएँ, जिनसे भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी हुईं और जीवन बदल गए।
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परमहंसों की लीला: पुकार पर दौड़े आते हैं
क्या सतगुरु केवल सुनते ही नहीं, पुकार उठते ही दौड़े चले आते हैं?
जब प्रेमी मुसीबत में फँसते हैं, राह बंद हो जाती है और कोई सहारा नहीं दिखता, तब सतगुरु की महिमा जीवंत घटनाओं में खुलती है।
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परमहंसों की लीला: सेवा और कुर्बानी
कैसी सेवा थी कि सतगुरु ने खुद सेवक को गले लगा लिया?
और कैसी कुर्बानी कि सेवक ने अपने शरीर को ही पुल बना दिया! सेवा, समर्पण और प्रेम की चरम सीमा की लीला, जहाँ सतगुरु सेवक पर रीझ जाते हैं।
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परमहंसों की लीला: कर्म फल से मुक्ति
क्या सतगुरु अपने सेवक के कर्म-बंधन काट देते हैं?
क्या आने वाली बड़ी विपदा भी उनकी कृपा से टल सकती है? इस मार्मिक सत्संग में यही गूढ़ रहस्य सच्ची घटनाओं के साथ खुलता है।
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परमहंसों की लीला: जानवरों की मुक्ति
क्या सतगुरु की कृपा केवल मनुष्यों तक सीमित है?
बंदर, भैंसा, साँप और शेर, सब सतगुरु की शरण में आकर कृपा पाते हैं: कभी करकमलों से बंदरों को प्रसाद, कभी आरती में स्थिर खड़ा भैंसा। 'सतगुरु सब जीवों का एक दाता है', एक बार सुनना शुरू किया तो अंत तक जुड़े रहेंगे।
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मेरा सतगुरु: अवतरण
क्या सच में परमात्मा नन्हे बालक के रूप में धरती पर आता है?
सतगुरु के पावन अवतरण का ऐसा वर्णन जिसे सुनकर हृदय भाव-विभोर हो उठता है। यह केवल जन्म कथा नहीं, एक दिव्य अवतरण का रहस्य है।
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श्री तृतीय पातशाही जी (भाग 1)
क्या महापुरुष रात को सोते नहीं, बल्कि सारी सृष्टि के जागरण का आधार होते हैं?
श्री तृतीय पातशाही जी के जीवन की अलौकिक, रहस्य भरी झलक, जिसे सुनकर मन श्रद्धा से भर उठता है और बुद्धि ठहर जाती है।
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श्री तृतीय पातशाही जी (भाग 2)
क्या साधारण जीवन जीते हुए भी कोई भीतर से पूर्ण परमात्मा से जुड़ा रह सकता है?
श्री तृतीय पातशाही जी का जीवन, जो साधारण लगकर भी अत्यंत चमत्कारी है: गृहस्थ में रहते हुए भीतर से जुड़े रहने की सीख।
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श्री चतुर्थ पातशाही जी
भक्ति का मार्ग फूलों से भरा है, या यह अग्नि-परीक्षा है?
श्री चतुर्थ पातशाही जी की ऐसी चमत्कारी लीलाएँ जो भीतर तक हिला देती हैं: यह केवल कथा नहीं, सच्ची भक्ति की कसौटी है।
नाम, विश्वास और भक्ति Satsang · 6
नाम की महिमा, अजपा जाप, गुरु चरणों की प्रीत और रोज़ के जीवन में भक्ति कैसे जिएँ: रोज़ सुनने लायक सत्संग।
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चरण कमल
क्या गुरु के चरण ही भक्ति का सबसे गहरा रहस्य हैं?
भक्ति का मार्ग जटिल नहीं, चार सरल सीढ़ियों का है, और उसकी शुरुआत गुरु चरणों की प्रीत से होती है। जिसने चरणों की प्रीत पा ली, उसने सब कुछ पा लिया।
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अजपा जाप
क्या ऐसा संभव है कि नाम बिना जपे भी भीतर चलता रहे?
अजपा जाप की महिमा, जो केवल साधना नहीं, जन्म-मरण के बंधन काटने वाला रहस्य है। नाम कैसे साँसों में अपने आप चलने लगता है, यहाँ समझिए।
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प्रैक्टिकल भक्ति
क्या केवल मीठा बोलना भी भक्ति बन सकता है?
हर व्यक्ति से प्रेम, नम्रता और मधुर वाणी से मिलना सीख लें, तो साधारण जीवन ही भक्ति बन जाता है। घर, दफ़्तर और रिश्तों में जीने लायक सत्संग।
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सतगुरु पर विश्वास
जब जीवन चारों ओर से हिलने लगे, तब साधक को कौन संभालता है?
जब परिस्थितियाँ डराने लगें और मन बार-बार टूटे, तब सतगुरु पर अटूट विश्वास कैसे सहारा बनता है। कठिन समय में ज़रूर सुनें।
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दर्शन की दात
कलियुग में सबसे अनमोल दात क्या है?
परमात्मा का नाम, और सिमरन के साथ ध्यान: गुरु की पावन मूरत को हृदय में बसाना। अमृत वेले का महत्व और बार-बार अभ्यास से कैसे वही मूरत अंतर में स्थिर हो जाती है।
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सतगुरु की महिमा
सतगुरु की एक झलक से व्याकुल मन तुरंत शांत क्यों हो जाता है?
सतगुरु शांति, सुख और प्रेम के सच्चे धाम हैं। एक डॉक्टर की सच्ची कथा भी, जो केवल श्री कृष्ण को मानते थे और जिन्हें सतगुरु के दर्शन में वही स्वरूप दिखा: उनका जीवन ही बदल गया।
अंतरमुखी भक्ति और विरह Antarmukhi Bhakti & Virah · 5
बाहर से भीतर की यात्रा। जो खोज रहे हो वह भीतर है: सतगुरु के निज रूप की ओर ले जाने वाले, हृदय को भिगो देने वाले सत्संग।
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भीतर मुड़ो
भक्ति बाहर के शोर में है, या भीतर के उस मौन में जहाँ सतगुरु प्रतीक्षा करते हैं?
महापुरुषों की वाणी का एक ही इशारा: जो खोज रहे हो वह भीतर है। बाहरी साधन सीढ़ियाँ हैं, असली मिलन भीतर है। भीतर मुड़ो, वहीं प्रभु प्रतीक्षा में हैं।
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शरीर के अंदर
जिस खज़ाने को हम बाहर ढूँढते हैं, क्या वह शरीर के अंदर ही है?
नाम, भक्ति, शांति और परमात्मा का अनुभव, सब भीतर है। सतगुरु के दिए शब्द का जाप भीतर के बंद द्वार खोलता है। हम भिखारी नहीं, भीतर अनंत धन वाले हैं; बस पहचान भूल गए हैं।
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सतगुरु जी का निज रूप
क्या हम सच में सतगुरु का साथ दे रहे हैं, या उनके काम में बाधा बने हैं?
बाहरी भक्ति सीढ़ी है, असली यात्रा भीतर है, सतगुरु के निज रूप तक। जैसे कुशल धोबी मैले कपड़े को निर्मल करता है, वैसे ही सतगुरु जीव को भीतर से शुद्ध करते हैं; अयोग्य मानकर भी निराश न हों।
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विरह (सुल्तान भक्ति)
मैं भूल जाऊँ, पर तू मुझे मत भूलना…
विरह, इश्क़ और मुर्शिद की दिव्य सुंदरता का रस। सूफ़ी फ़कीरों ने परमात्मा को 'हुस्ने-कमाल' कहा: ऐसा सौंदर्य जिसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। सुनते-सुनते हृदय भीगने लगता है।
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प्रभु से मिलने की चाह (विरह)
मैं द्वार पर खड़ी हूँ, कोई मेरे प्रियतम को संदेश दे दे…
आत्मा की वह विरह-व्यथा जहाँ जीव सतगुरु के दर्शन के लिए तड़पता है। जिस हृदय में विरह की आग जलती है, उसी को मिलन का अमृत मिलता है। सुनकर दिल में एक ही प्रार्थना उठती है: हे मालिक, ऐसी प्यास दे दे।
रोज़ साथ बैठकर ध्यान करें
हर सुबह अमृत वेला में साधक Zoom पर एक साथ नाम जाप और ध्यान करते हैं। यह भी निःशुल्क है।