दिव्य अमृत धारा › 🔥 अंतरमुखी भक्ति और विरह
विरह (सुल्तान भक्ति)
मैं भूल जाऊँ, पर तू मुझे मत भूलना…
विरह, इश्क़ और मुर्शिद की दिव्य सुंदरता का रस। सूफ़ी फ़कीरों ने परमात्मा को 'हुस्ने-कमाल' कहा: ऐसा सौंदर्य जिसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। सुनते-सुनते हृदय भीगने लगता है।
इसके बाद सुनें: अंतरमुखी भक्ति और विरह
रोज़ साथ बैठकर ध्यान करें
हर सुबह अमृत वेला में साधक Zoom पर एक साथ नाम जाप और ध्यान करते हैं। यह भी निःशुल्क है। समय और link