
ईश्वरवादियों के मतानुसार ईश्वर असीम नित्य एवं सर्वज्ञ होने के साथ-साथ सर्वशक्तिमान तथा पूर्ण रूप से शुभ या अत्यंत दयालु है और वही समस्त प्राणियों सहित संपूर्ण जगत का रचयिता, पालनकर्ता एवं प्रशासक है। परंतु ईश्वरवादियों के इस सिद्धांत के विरूद्ध एक गंभीर चुनौती है। निम्नलिखित तीन कथनों पर विचार करने पर यह समस्या स्पष्ट होती हैः
(i) संसार में सर्वत्र दुःख और मानवीय दुराचरण के रूप में अशुभ का अस्तित्व है।
(ii) इस संसार का रचयिता ईश्वर सर्वशक्तिमान है।
(iii) ईश्वर अत्यंत दयालु और पूर्ण शुभ है।

अब यदि इन तीनों कथनों में से किसी को असत्य मान लिया जाए तो अशुभ की समस्या उत्पन्न नहीं होती। परंतु ईश्वरवादी इन तीनों कथनों को सत्य मानते हैं। परंतु इससे ईश्वर की सर्वशक्तिमतता एवं दयालुता के साथ संसार में व्याप्त अशुभ का सामंजस्य बिठाना संभव नहीं हो पाता। यदि इस जगत का रचयिता ईश्वर सर्वशक्तिमान तथा अत्यंत दयालु हैं तो इसमें अशुभ का अस्तित्व क्यों है? यदि स्वयं पूर्ण रूप से शुभ होने के कारण ईश्वर ने इस अशुभ को उत्पन्न नहीं किया, तो इस संसार में यह अशुभ कहां से आया है? यदि ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य शक्ति ने इस अशुभ को उत्पन्न किया है तो यह ईश्वरवादियों को मान्य नहीं होगा क्योंकि इससे ईश्वर की सर्वशक्तिमान एवं दयालुता से पूर्ण स्वरूप का खंडन होता है, अर्थात् किसी दूसरी शक्ति द्वारा अशुभ उत्पन्न करने पर यह सिद्ध होता है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान एवं दयालु नहीं है। परंतु पुनः पूर्ण शुभ एवं दयालु होने के कारण ईश्वर भी यह अशुभ उत्पन्न नहीं कर सकता।
Jab Ishwar Ne Sabkuch Banaya Hai Tho Koi Subh Koi Asubh Kaise Ho Sakta Hai ?

इस प्रकार जगत में अशुभ की उपस्थिति के संबंध में अगर ये कहा जाए कि ईश्वर अशुभ का निराकरण करना चाहता है किंतु वह ऐसा करने में असमर्थ है, तो उनका ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं रह जाता। वह एक सामान्य मनुष्य की भांति किसी अन्य शक्ति के समक्ष असहाय दर्शक मात्र हो जाता है। परंतु ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता बनाए रखने के लिए यदि ईश्वरवादी यह कहते हैं कि पूर्णतः समर्थ होते हुए भी वह अशुभ का निराकरण नहीं करना चाहता तो निश्चय ही उसे अत्यंत दयालु तथा प्रेममय नहीं माना जा सकता। ऐसा ईश्वर एक शक्तिशाली, क्रूर, अत्याचारी मनुष्य के समान हो जाता है। उपर्युक्त उलझनपूर्ण दुविधा से बचने के लिए यदि ईश्वरवादी यह कहते हैं कि ईश्वर अशुभ का निराकरण करने में पूर्णता समर्थ है और वह ऐसा करना भी चाहता है तो उनसे यह पूछा जा सकता है कि फिर संसार में अशुभ का अस्तित्व क्यों बना रहता है। इस प्रश्न का भी वे संतोषजनक तथा युक्तिसंगत उत्तर नहीं दे पाते। वास्तव में ईश्वर को सर्वशक्तिमतता और दयालुता इन दोनों की बनाए रखते हुए ईश्वरवादियों के लिए जगत में अशुभ के अस्तित्व की तर्कसंगत व्याख्या करना संभव प्रतीत नहीं होता।

इस संदर्भ में अशुभ की समस्या के दो प्रमुख पक्ष हैं- सर्वशक्तिमान तथा अत्यंत दयालु ईश्वर द्वारा रचित जगत में अशुभ का उत्पन्न होना तथा इस जगत में उसके अस्तित्व का बना रहना। प्राचीन काल में ऐपिक्युरस ने इस समस्या को उठाया था। मध्य युग में अगस्टाईन तथा ऐक्वाईनस इन दो ईश्वरवादी दार्शनिकों ने भी अशुभ की इस समस्या पर विचार किया था और अपनी ईश्वर विचारधारा के अनुरूप इसके कुछ समाधान भी प्रस्तुत किये थे। आधुनिक दार्शन में अनुभववादी दार्शनिक ह्यूम ने अशुभ की समस्या की ईश्वरवाद के विरूद्ध प्रबल तर्क के रूप में प्रस्तुत किया है। इस समस्या के आधार पर उहोंने यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि अशुभ से परिपूर्ण इस विश्व का रचयिता सर्वशक्तिमान तथा पूर्णतः शुभ ईश्वर नहीं हो सकता। भारतीय संदर्भ में जैन दार्शनिकों ने भी अशुभ की समस्या को ईश्वरवाद के विरूद्ध एक प्रबल तर्क के रूप में प्रस्तुत किया है। कुछ ईश्वरवादी दार्शनिकों ने स्वयं यह स्पष्टः स्वीकार किया है कि अशुभ की समस्या उनके सिद्धांत के विरूद्ध निरिश्वरवादियों द्वारा प्रस्तुत एक गंभीर चुनौती है।
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ईश्वरवादियों ने ईश्वर की सर्वशक्मितता एवं हितकारिता के साथ अशुभ की समस्या का सामंजस्य बिठाने के लिए कुछ समाधान भी प्रस्तुत किए हैं। उदाहरणस्वरूप कुछ ईश्वरवादियों का मत है कि संसार में शारीरिक तथा मानसिक दुःख के रूप में जो अशुभ है, वह वस्तुतः मनुष्य के अपने पाप का परिणाम है। ईश्वर मनुष्य को उसके पापों का दंड देने के लिए अशुभ उत्पन्न करता है। परंतु यह सिद्धांत उन बच्चों एवं पशुपक्षियों के दुःख की व्याख्या करने में असमर्थ है जिन्होंने कोई पाप किया है। कुछ ईश्वरवादियों का कथन है कि प्राकृतिक आपदाओं से उत्पन्न दुःख के लिए एक चेतावनी है जिसके द्वारा अपने रचयिता ईश्वर की महानता और अपार शक्ति को पहचान सकता है। परंतु इस तर्क के द्वारा मनुष्य के स्वयं के द्वारा उत्पन्न नैतिक अशुभ की व्याख्या नहीं हो पाती। पुनः कुछ ईश्वरवादी यह मानते हैं कि शुभ को जानने और उसके महत्व को समझने के लिए अशुभ का होना अनिवार्य है। परंतु यह भी नैतिक दृष्टि से दृष्टि से उचित नहीं है, क्योंकि इससे शुभ स्वयं अशुभ पर निर्भर हो जाएगा। पुनः चूंकि ईश्वर सर्वशक्तिमान है अतः वह मनुष्य को अशुभ का अनुभव कराए बिना शुभ के स्वरूप और महत्व को समझने की क्षमता प्रदान कर सकता है। कुछ ईश्वरवादी दार्शनिक अशुभ को समस्या को एक भ्रम मानते हैं। वे इसकी वस्तुपरक सत्ता को स्वीकार नहीं करते।
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परंतु यह तो समस्या के समाधान के प्रयास के बदले समस्या को ही खत्म कर देने वाली बात लगती है। प्राकृतिक नियम के आधार पर भी जगत में व्याप्त अशुभ की समस्या का विश्लेषण का प्रयास किया जाता है। परंतु ईश्वरवादी स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान एवं जगत का रचयिता है, इसलिए यहां भी ईश्वर अशुभ के उत्तरदायित्व से नहीं बच पाता। पुनः संकल्प स्वातंत्र्य का दुरूपयोग किया है, जिसका परिणाम अशुभ है। परंतु यह उल्लेखनीय है कि मनुष्य को संकल्प स्वातंत्र्य प्रदान करने वाला स्वयं ईश्वर है। ईश्वर चाहता तो मनुष्य से ऐसा कोई कर्म ही नहीं करवाता, जिससे मनुष्य को दुःख हो और जगत में अशुभ उत्पन्न न हो।
अंततः रैशडेल एवं ब्राईटमैन जैसे दार्शनिक इन समाधानों से निराश होकर भी स्वीकार करते हैं कि ईश्वर पूर्ण शुभ तो है, परंतु सर्वशक्तिमान नहीं। परंतु इससे ईश्वरवाद की मान्यता खंडित होती है। अतः ईश्वरवादी मान्यता के साथ कि ईश्वर पूर्ण दयालु एवं सर्वशक्तिमान है, अशुभ की समस्या का सामंजस्य बिठाना तार्किक दृष्टि से संभव नहीं लगता।

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